📷 चित्र स्रोत: Hindustan Times (via NewsData)
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सुप्रीम कोर्ट ने डिजिटल गिरफ्तारी धोखाधड़ी में बैंकों की जिम्मेदारी पर RBI के ड्राफ्ट केवाईसी नियमों की समीक्षा का आदेश दिया
✍️ Hindustan Times
🗓 30 अक्टू. 2026, 07:54 AM
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सुप्रीम कोर्ट ने RBI के ड्राफ्ट केवाईसी नियमों को अंतिम रूप देने से पहले जांचने का निर्देश दिया, ताकि डिजिटल गिरफ्तारी धोखाधड़ी में बैंकों की जिम्मेदारी तय की जा सके।
सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) द्वारा तैयार किए गए ड्राफ्ट केवाईसी नियमों को अंतिम रूप देने से पहले जांचने का निर्देश दिया है। यह कदम हाल ही में हुए डिजिटल गिरफ्तारी धोखाधड़ी मामलों में बैंकों की भूमिका को लेकर उठे चिंताओं के बीच उठाया गया है, जहाँ कई लोगों को बड़े पैमाने पर वित्तीय नुकसान हुआ है।
इन धोखाधड़ी में अपराधियों ने नकली डिजिटल गिरफ्तारी नोटिस का प्रयोग करके पीड़ितों को बैंक खातों में पैसे ट्रांसफर करने के लिए फँसाया, जिससे बैंकों की जिम्मेदारी पर सवाल उठे। कोर्ट का यह कदम बैंकों की उत्तरदायित्व को स्पष्ट करने और भविष्य में ऐसे स्कैम को रोकने के लिए नियमों को सुदृढ़ करने की दिशा में है।
RBI ने 30 नवंबर तक संशोधित केवाईसी दिशानिर्देश जारी करने का लक्ष्य रखा है। वर्तमान में न्यायिक परीक्षा के अधीन यह ड्राफ्ट डिजिटल पहचान की कड़ी जाँच और उच्च जोखिम वाले लेन‑देन की निगरानी को सख्त बनाने का प्रस्ताव रखता है। यदि लागू किया गया, तो ये नियम बैंकों और वित्तीय संस्थानों पर अधिक कड़ी अनुपालन बाध्यताएँ थोप सकते हैं।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट की भागीदारी इस मुद्दे की गंभीरता को दर्शाती है और एंटी‑फ्रॉड उपायों को तेज़ी से लागू करने में मदद कर सकती है। बैंकिंग संघों सहित सभी हितधारक परिणाम को बारीकी से देख रहे हैं, क्योंकि यह भारत में डिजिटल भुगतान के नियामक ढांचे को पुनः आकार दे सकता है।
इन धोखाधड़ी में अपराधियों ने नकली डिजिटल गिरफ्तारी नोटिस का प्रयोग करके पीड़ितों को बैंक खातों में पैसे ट्रांसफर करने के लिए फँसाया, जिससे बैंकों की जिम्मेदारी पर सवाल उठे। कोर्ट का यह कदम बैंकों की उत्तरदायित्व को स्पष्ट करने और भविष्य में ऐसे स्कैम को रोकने के लिए नियमों को सुदृढ़ करने की दिशा में है।
RBI ने 30 नवंबर तक संशोधित केवाईसी दिशानिर्देश जारी करने का लक्ष्य रखा है। वर्तमान में न्यायिक परीक्षा के अधीन यह ड्राफ्ट डिजिटल पहचान की कड़ी जाँच और उच्च जोखिम वाले लेन‑देन की निगरानी को सख्त बनाने का प्रस्ताव रखता है। यदि लागू किया गया, तो ये नियम बैंकों और वित्तीय संस्थानों पर अधिक कड़ी अनुपालन बाध्यताएँ थोप सकते हैं।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट की भागीदारी इस मुद्दे की गंभीरता को दर्शाती है और एंटी‑फ्रॉड उपायों को तेज़ी से लागू करने में मदद कर सकती है। बैंकिंग संघों सहित सभी हितधारक परिणाम को बारीकी से देख रहे हैं, क्योंकि यह भारत में डिजिटल भुगतान के नियामक ढांचे को पुनः आकार दे सकता है।